Monday, 23 November 2015

जीवन यात्रा ।

महसूस करता हूँ क्षण तुझे
धव्यन्यात्मकता पाता हूँ तेरी
जीवन राग व उन्मादो का मिलन
कर्मण्यता हुई परिवर्तित करती जाती
जीवन मेरा
महसूस करता जाता
चलती हैं जीवन यात्रा
जीया हूँ
जीवन तुझे हर क्षण रीता
विवेक ओर भावों बीच
संघर्ष पाया निरंतर
महसूस करता जाता
अतीत मेरा
बेपरिणाम गुजरा हैं
पदार्थ संग्रहण की यात्रा
अंजाम शून्य
सालता अतीत सालती हैं जिन्दगी
महसूस होता बार बार
रही कहां यात्रा यह
आनन्द विहिन जिन्दगी
क्षण की गहराई अछूती रही
होता जाता संचय जीया
यात्रा समय चाहे
क्षण नहीं
पर मैं क्षण मोह रहा
जो हुआ अविलम्ब नष्ट
क्षण समय कहां हुआ मेरा
कास कुछ लंबाई पाती जिन्दगी
अब विसर्जन चाहता हूँ
क्षण तुझमे
समूचा व्यक्तित्व लेकर
डूबना चाहता हूँ
क्षण तेरी गहराई मे
अथाह गहराई
सत्य के मोती
बेबूझ बना
चाहता हूँ पाना
यात्रा की अंतिम मंजिल ।
छगन लाल गर्ग।


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