Monday, 16 November 2015

होता रहेगा ।

होता रहेगा
अरमानो का बिखराव
बिखरी जिन्दगी तले
जो ठौर तलाशती हैं विश्वासो का
विश्वास चाहती हैं जिन्दगी
हम छाया बने अपनों का
जो छिपकते जाते जौक बन
चूसते हैं जिन्दगी
होता रहेगा
अरमानो का बिखराव
विवेक जीते शीर्षस्थो के तले
जो नित देते अकाट्य तर्क
आदर्श व अधिकारो का
कि भावना जीते अबोध
निरीह बन जीने
हो जाते विवश
निर्जीव जिन्दगी
होता रहेगा
अरमानो का बिखराव
कि लेखनी के धनी
ऑख मूदे करते रहेंगे
शास्त्रो का बखान
देते रहेंगे
चान्द तारों को नित नयी उपमाये
कि यथार्थ जीवन होगा
रैगने को विवश
आम आदमी दम घूटता
जीता रहेगा
मौत झेलती जिन्दगी
होता रहेगा
अरमानो का बिखराव
कि विश्वास ढूँढता
सरल मानव
खाता जायेगा नित नयी
अनजानी ठोकरे
विश्वासो की
कि भाव जगत होता रहेगा
विरान हताश
तलाशता मानव की जिन्दगी
स्वार्थों की बहती नदी
लेती जाती बाढ़ का आकार
तबाही कगार खड़ी
मानवता
बान्धना होगा इस नदी पर
पूल नया मानवीय इंजीनियरों को
विश्वासो का
कि अरमान पूरे अहसास पाये
भूली भटकी मानवता
मन चाही मंजिल पाये
यह जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग।


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