अवगुण्ठित ही रखता
सत्य तुझे
तभी पाता व्यक्तित्व पहचान
प्रबुद्ध मनुष्य बनता
सत्य छिपाये
दिखता हूँ सीधा सपाट
बाहर बाहर
बहुत सरल समझदार
भीतर के मतलबी सत्यो का जंजाल
बाहर नहीं लाता
संयमी बन जाता
तपस्वी सा
भीतरी आपा रोकता हूँ
मजबूती से
तभी गुम जाता
मेरा असलीपन
होता रहता
सौम्य ओर सुशील
दिखता हूँ सीधा सपाट
समझदार
बेहतरीन जी लेता हूँ
जिन्दगी दोहरी
छाया मेरी पीछे चलती हैं
सूर्य रखता हूँ सामने
दिखने लगता हूँ साफ साफ
ओरो के प्रकाश का होता सहारा
ओर सूर्य रश्मिया हारती जाती
भीतरी सत्य जाने बिना
मुझे ओर निखारती
करती अस्तित्व मेरा उज्ज्वल
छाया सूक्ष्म का
सत्य हारता
पीछे छोडता व्यक्तित्व
छाया
सुनो सत्य तुझे रोकता मैं
सूर्य का प्रकट सत्य मेरा
भीतर सूक्ष्म छाया मात्र
बाहरी बिम्ब निखरा सत्य
जो मैं प्रकट करता
मूल सत्य
कहां देखती दुनिया
रोशनी रहते भी
सूर्य ओर छाया मेरी
दोनों सत्य हैं
सूर्य को पीठ दिये
कभी चलता हूँ
तभी असलियत पाता
जिन्दगी तेरी
छाया सूक्ष्म बनी आती हैं आगे
दीदार होते ही
ठावस पाता हूँ
दिखता जाता
जीवन नद का किनारा
ओर बन जीता जाता
आदमी ।
छगन लाल गर्ग।
सत्य तुझे
तभी पाता व्यक्तित्व पहचान
प्रबुद्ध मनुष्य बनता
सत्य छिपाये
दिखता हूँ सीधा सपाट
बाहर बाहर
बहुत सरल समझदार
भीतर के मतलबी सत्यो का जंजाल
बाहर नहीं लाता
संयमी बन जाता
तपस्वी सा
भीतरी आपा रोकता हूँ
मजबूती से
तभी गुम जाता
मेरा असलीपन
होता रहता
सौम्य ओर सुशील
दिखता हूँ सीधा सपाट
समझदार
बेहतरीन जी लेता हूँ
जिन्दगी दोहरी
छाया मेरी पीछे चलती हैं
सूर्य रखता हूँ सामने
दिखने लगता हूँ साफ साफ
ओरो के प्रकाश का होता सहारा
ओर सूर्य रश्मिया हारती जाती
भीतरी सत्य जाने बिना
मुझे ओर निखारती
करती अस्तित्व मेरा उज्ज्वल
छाया सूक्ष्म का
सत्य हारता
पीछे छोडता व्यक्तित्व
छाया
सुनो सत्य तुझे रोकता मैं
सूर्य का प्रकट सत्य मेरा
भीतर सूक्ष्म छाया मात्र
बाहरी बिम्ब निखरा सत्य
जो मैं प्रकट करता
मूल सत्य
कहां देखती दुनिया
रोशनी रहते भी
सूर्य ओर छाया मेरी
दोनों सत्य हैं
सूर्य को पीठ दिये
कभी चलता हूँ
तभी असलियत पाता
जिन्दगी तेरी
छाया सूक्ष्म बनी आती हैं आगे
दीदार होते ही
ठावस पाता हूँ
दिखता जाता
जीवन नद का किनारा
ओर बन जीता जाता
आदमी ।
छगन लाल गर्ग।
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