Saturday, 7 November 2015

नहीं भाता संगीत ।

नहीं भाता संगीत
बजता हुआ रेडियो की संगीत धुने
उभरते स्वर धक्का देते सम्पूर्ण चित
अचकचाये सुनना नियति मेरी
लगता तौड फौड देंगे भीतरी राग
जो चित भरी निर्मल नेह झील गहरी
जहाँ खिलते नित सपनों के कुसुम
नित नया सौन्दर्य लिए
पराग कण केसर संग विचरते सम्पूर्ण अस्तित्व
मिट मिट जाते दबे से दमित राग भाव सारे
यह संगीत राग उथला घना बेचैनी भरा
वह राग हैं कहां
जोडता जीवन के सुर
दर्शन जीवन बना जीता जागता संगीत राग
अब वह नहीं रहा
यादों की खाई मे सोया पडा हैं
वक्त की रफ्तार ने दबोचा हैं उसे
मिटते अरमानो की तरह
अब संगीत भी घनी भीड़ सा
ऊहापोह भरा जीवन जीता
विकल हुआ सा विवश हूँ संगीत झेल जीने को
ओर यह भीतरी चित तन्हाई की अनुभूति पाता
लिपटना चाहता खोये सुरों से
जिसमें राग मेरा रहा जीवन मेरा रहा
इस अंधी दौड़ का गुजरा वक्त हूँ मैं
जिसे मुँह उठाने की इजाजत नहीं
मात्र विस्मृतियो की घनी कालिमा मे
मौन साधे सोते रहने की इजाजत हैं
यान्त्रिक मानव का यह युग
जो मात्र तन सार जीता हैं
 नाम बदलाव चाहे युग मनुष्य का
शायद अंतिम दौर मानव रहने का
फिर तो रौबर्ट बने जीना ही
आज के युग का सत्य हैं ।
छगन लाल गर्ग।










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