घर तो वही हैं वैसा का वैसा
अंतर ढूँढे मिलता नही
न दीवारे बदली न दरवाजा
चिर स्थापित
वहीं साजो सामान पहचाना पहचाना
नीम के वृक्ष छाया देते आते जातो को
घर के सामने जाती सड़क पर जाते हुए लोग
आते हुए लोग पल भर रुकते छाया तले
हाल चाल पूँछ आगे बढ़ते
ठीक वहीं वहीं जो भोगा कभी
अंतर केवल यह
कि अब घर भीतर का प्रवेश वर्जित हुआ हैं
ऑगन मे खाट पर मुडा बिस्तर
सूत डोरी से बुनी ढीली ढाली खटिया
शून्य ताकता मित्र का चेहरा देखता हूँ
गहन काली उदासियो का अंबार चेहरे को ढके हैं
उठने की कोशिश मे
देखा मैंने बल नकारा होते
कई दिनों से बीमार अचकचाये जीते हैं
पैशन का पैसा घर चलाता हैं
बीमारी झैलना ही नियति हैं
बच्चे शादीशुदा बेरोजगार हैं
ठंडी आह के अतिरिक्त मित्र मैं तुम्हे क्या दू
संवेदना देना भी वेदना ही हैं ।
छगन लाल गर्ग।
अंतर ढूँढे मिलता नही
न दीवारे बदली न दरवाजा
चिर स्थापित
वहीं साजो सामान पहचाना पहचाना
नीम के वृक्ष छाया देते आते जातो को
घर के सामने जाती सड़क पर जाते हुए लोग
आते हुए लोग पल भर रुकते छाया तले
हाल चाल पूँछ आगे बढ़ते
ठीक वहीं वहीं जो भोगा कभी
अंतर केवल यह
कि अब घर भीतर का प्रवेश वर्जित हुआ हैं
ऑगन मे खाट पर मुडा बिस्तर
सूत डोरी से बुनी ढीली ढाली खटिया
शून्य ताकता मित्र का चेहरा देखता हूँ
गहन काली उदासियो का अंबार चेहरे को ढके हैं
उठने की कोशिश मे
देखा मैंने बल नकारा होते
कई दिनों से बीमार अचकचाये जीते हैं
पैशन का पैसा घर चलाता हैं
बीमारी झैलना ही नियति हैं
बच्चे शादीशुदा बेरोजगार हैं
ठंडी आह के अतिरिक्त मित्र मैं तुम्हे क्या दू
संवेदना देना भी वेदना ही हैं ।
छगन लाल गर्ग।
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