हारा हूँ जिन्दगी तुझे
भाता हैं हारना मुझे
जीत हैं एक दीवा स्वप्न
फिसलता नित हाथ मेरे
हारा हूँ जिन्दगी तुझे
बनावट हैं अनोखी तुम्हारी
भाये बिना जीता रहा हूँ
समझ आती नहीं अभी भी
तू हार हैं कि जीत हैं
आई जहां से भी तुम
अबूझा सा जीता रहा मैं
लगता समूचे काल खण्ड
बनती जाती मेरी प्रति छाया
हारा हूँ जिन्दगी तुझे
अवगुणो की जीत तुम
भागता हूँ अवगुणो से
पाया भी जीत जब भी
खटकती हर श्वास मेरी
महसूसता हूँ रात दिन
अटकती जिन्दगी मंझधार हो
अपनाता जाता जिन्दगी तुम्हारी
हार का साम्राज्य घना
हारता मैं जिन्दगी तुझे
पावनता की चाह मे
जीत हार रूप तेरा
आकार तेरा वस्त्र सा
अवगुञ्ठित तुम
जीत हार डोर हो
अवगुण आडे सदगुण सीधे
ताने बाने से निर्मित हो
हार जीत का मर्म जिन्दगी
पाता जाता अभी जीता हूँ
झूठ फरेब का राह चमकीला
हृदय भीतर ही टूट जाता
टूटे चित नहीं सुहाता
छोड़ राह यह जीता हूँ
आओ हार स्वागत तुम्हारा
प्रार्थना उठती हैं भीतर से
इसका तनिक सा मर्म समझ लो
तंत्रीनाद यह सुनो तो
निर्मल सी महिन धारा हैं यह
राग उसी मे खोने दो
स्वीकार्य हैं हार जिन्दगी
हारा हुआ ही जीने दो।
छगन लाल गर्ग।
भाता हैं हारना मुझे
जीत हैं एक दीवा स्वप्न
फिसलता नित हाथ मेरे
हारा हूँ जिन्दगी तुझे
बनावट हैं अनोखी तुम्हारी
भाये बिना जीता रहा हूँ
समझ आती नहीं अभी भी
तू हार हैं कि जीत हैं
आई जहां से भी तुम
अबूझा सा जीता रहा मैं
लगता समूचे काल खण्ड
बनती जाती मेरी प्रति छाया
हारा हूँ जिन्दगी तुझे
अवगुणो की जीत तुम
भागता हूँ अवगुणो से
पाया भी जीत जब भी
खटकती हर श्वास मेरी
महसूसता हूँ रात दिन
अटकती जिन्दगी मंझधार हो
अपनाता जाता जिन्दगी तुम्हारी
हार का साम्राज्य घना
हारता मैं जिन्दगी तुझे
पावनता की चाह मे
जीत हार रूप तेरा
आकार तेरा वस्त्र सा
अवगुञ्ठित तुम
जीत हार डोर हो
अवगुण आडे सदगुण सीधे
ताने बाने से निर्मित हो
हार जीत का मर्म जिन्दगी
पाता जाता अभी जीता हूँ
झूठ फरेब का राह चमकीला
हृदय भीतर ही टूट जाता
टूटे चित नहीं सुहाता
छोड़ राह यह जीता हूँ
आओ हार स्वागत तुम्हारा
प्रार्थना उठती हैं भीतर से
इसका तनिक सा मर्म समझ लो
तंत्रीनाद यह सुनो तो
निर्मल सी महिन धारा हैं यह
राग उसी मे खोने दो
स्वीकार्य हैं हार जिन्दगी
हारा हुआ ही जीने दो।
छगन लाल गर्ग।
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