Monday, 9 November 2015

अब नहीं होता ।

अब नहीं होता
फिसलते अरमानो का बहाव
नहीं होते सपने ऊँचाईयो मे गुम
आकाक्षाऐ एकाकार हुई अस्तित्व लीन
नहीं मिलते अरमानो के पद चिन्ह
कि कभी जीवन धरातल मे रखें हो कदम
अब जीवन होने का अर्थ हैं खोया खोया
गुमनाम होता सम्पूर्ण व्यक्तित्व घनी भीड़ बीच
व्यक्तित्व का हर पल खोया सा
जीता जाता अपना सत्य
जिसका निर्माता रहा वह खुद
ओर यह सत्य अजीब सुनहरी रंगिनियो मे भ्रमित सा
ढूँढता नित अपना बिम्ब
जिसे पाते पाते सरकती जाती खामोश जिन्दगी
बिना कुछ पाये बिना सत्य पहचाने
हाथ रीते ही अहसास पाता स्वयं भरा भरा
मोह मादक संसार का साक्षी
फिसलता मृगतृष्णा के भंवर तले
विलय पाता स्वयं अंश बन वासना के राग मे
चेतन तत्व विकल हो बार बार ढूँढता किनारा
जीवन का
अब नहीं होता कि जताऊ अपना विशिष्ट प्रकार
जमाने का सत्य खुला खुला आतुर बताने को
कि लो जागता जीवन मेरा
जहाँ नहीं भावनाओं का ठहराव
अंतहीन दौड़ का अभ्यास करता
कि पा पा जाऊँ
सम्पूर्ण सुख सौन्दर्य का पारावार
कडवा यथार्थ बना जीवन
बेचता हैं भाव
ओर बिकता जाता व्यक्तित्व
घने बाजार की चौन्धिया रोशनी मे
चलता जाता सुख लेन देन का व्यापार
यह काम चलाऊ तो हैं इसे सुख ही कहती दुनिया
अब नहीं होता
मन की भावनाओं का संसार बिके
ओछी मानवता से परहेज करता जाता मन
सुख खरीदने निमित
सामर्थ्य सीमा के अंतिम छोर तक
अब नहीं होता
भीतर के नेह का रूदन शास्वत
कि नेह हो राधा कि मीरा का
स्नेह के शास्वत पलो की कद्र
दफन हुई ताजमहल की नीव तले
आज का नेह कंगूरा बना ऊँचाई कहता हैं अपनी
यह वेदना की कसक सभ्य बन विकास पाई हैं
वेदना का इन्तजाम आधुनिक हैं
अतिशय बाजारू
सुख की ललक दौडता हाफता
शैतान की सारी प्रतिभा लिए
अंतर रहा पर तनिक अदृश्य रहा
मानव ओर शैतान बीच
केवल संवेदना ओर रूदन की शाश्वता का
जिसे पहचान परख जीना ही
सत्य जीना हैं ।
छगन लाल गर्ग ।

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