आग्रह नही हैं मेरा
तुम्हारी अपनी दुनिया
जिसे जीना चाहते तुम
ओर मेरा आग्रह
तुम्हारे जीने की अडचन बने
नहीं चाहता
अस्मिता तुम्हारी
आबाद रहे
अनाग्रही हूँ मैं
उधर तुम्हारी बुद्धिमता का
कायल भी हूँ
खूब निछोडते हो
स्वार्थ सत्यो का
हर पल की वसूल लेते
कीमत
त्यागी हो
मानवता के
घने पुजारी हो
विवेक के
बहुत बढ़ चुके तुम
आगे
प्रगति तुम्हारी प्रशंसनीय
जटिल हो तुम
तर्क वितर्क का ताना बाना
बडा गुम्फनीय
चक्कर आते हिलता हूँ मैं
अनुकरण भी अकथनीय
जीवन मूल्यों की पुर्नस्थापना मे
बड़े प्रवीण तुम
नये तर्को के पैबन्द
अच्छे लगाते
झुंझारू व्यक्तित्व हैं तुम्हारा
अच्छी कर लेते हो
व्याख्या जीवन की
भरा भरा दिखता
तुम्हारे सुख का किला
साधनों का भीड़ भरा मेला
घेर चुका तुम्हें
बनना चाहता हूँ मैं
तनिक सा
अनाग्रही
कहना तो पडेगा
सुनना तुम्हारी मर्जी हैं
मात्र एक आग्रह
नहीं दूँगा
तुम्हारी अस्मिता पर चौट
भीतर बहता
एक भाव का स्त्रोत
संवेदना की निर्मल धार
जहां स्नेह बहता हैं
अमिट जीवन देय
मत रोको उसे
मत बनाओ तर्को की ऊँची दीवार
बोद्धिकता तुम्हारी
मात्र शब्दों का जंजाल
ढहाओ उसे
बहने दो निर्मल
संवेदना की नेह धार
जीवन धरातल
बुद्धि का रेगिस्तान
मत होने दो
मुक्त करो मानवता
बनने दो मानव को मानव
आग्रह नहीं हैं मेरा
छोडता हूँ विवेक
तुम्हारे ।
छगन लाल गर्ग।
तुम्हारी अपनी दुनिया
जिसे जीना चाहते तुम
ओर मेरा आग्रह
तुम्हारे जीने की अडचन बने
नहीं चाहता
अस्मिता तुम्हारी
आबाद रहे
अनाग्रही हूँ मैं
उधर तुम्हारी बुद्धिमता का
कायल भी हूँ
खूब निछोडते हो
स्वार्थ सत्यो का
हर पल की वसूल लेते
कीमत
त्यागी हो
मानवता के
घने पुजारी हो
विवेक के
बहुत बढ़ चुके तुम
आगे
प्रगति तुम्हारी प्रशंसनीय
जटिल हो तुम
तर्क वितर्क का ताना बाना
बडा गुम्फनीय
चक्कर आते हिलता हूँ मैं
अनुकरण भी अकथनीय
जीवन मूल्यों की पुर्नस्थापना मे
बड़े प्रवीण तुम
नये तर्को के पैबन्द
अच्छे लगाते
झुंझारू व्यक्तित्व हैं तुम्हारा
अच्छी कर लेते हो
व्याख्या जीवन की
भरा भरा दिखता
तुम्हारे सुख का किला
साधनों का भीड़ भरा मेला
घेर चुका तुम्हें
बनना चाहता हूँ मैं
तनिक सा
अनाग्रही
कहना तो पडेगा
सुनना तुम्हारी मर्जी हैं
मात्र एक आग्रह
नहीं दूँगा
तुम्हारी अस्मिता पर चौट
भीतर बहता
एक भाव का स्त्रोत
संवेदना की निर्मल धार
जहां स्नेह बहता हैं
अमिट जीवन देय
मत रोको उसे
मत बनाओ तर्को की ऊँची दीवार
बोद्धिकता तुम्हारी
मात्र शब्दों का जंजाल
ढहाओ उसे
बहने दो निर्मल
संवेदना की नेह धार
जीवन धरातल
बुद्धि का रेगिस्तान
मत होने दो
मुक्त करो मानवता
बनने दो मानव को मानव
आग्रह नहीं हैं मेरा
छोडता हूँ विवेक
तुम्हारे ।
छगन लाल गर्ग।
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