Tuesday, 17 November 2015

अटका हैं मन।

अटका हैं मन
तृष्णा विवर मे
खोजता जाता
रंगिनियो के तार
जो दे सके
हृदय तंत्री मे स्वाद
खुले द्वार अतृप्त वासनाओ के
बेमेल भाव मिले
कहें विगत
खोले पिटारा
वितृष्णाओ का
ओर
होता रहे भाव मिश्रण
अटका हैं मन
सुनहरे पल विगत मे
जहाँ पाया
व्यक्तित्व हीन अस्तित्व
अंहकार विसर्जित जीवन
राग रागिनियो की बहती
सरिताये
लहरों संग भावनाओ ने
गीत गाये
अटका हैं मन
नेह बहे सपनों मे
जहां सुख का दरिया
वेदना ताप जलता
रीता रहा
निष्ठुर दीप विरह के
नित जलते रहे
स्मृति खाती रही
दर्द की दवा
अटका हैं मन
यौवन की मदिरा मे
पीते रहे
स्पर्श रूप ओर रस का
प्याला
ओर जीना हुआ
सुरभि के मादक
वातायन मे
अटका हैं मन
अतीत की पराजय मे
जहां मन हारा थका
शिथिल हुआ
अंहकार तुष्टि मे
पराजित हुआ
अटका हैं मन
सौन्दर्य जंजीर मे
हृदय ने संजोये
हीरक नेह हार
आशक्ति के
जो स्पर्श करने से
टूटे
अटका हैं मन
ओरो के वैभव मे
जहाँ ईर्ष्या की आग
धधकी घनी
करती हृदय का
विरोध
देती रही मस्तिष्क को
गति
वैभव जीने की
अटका हैं मन
शीतल मदहोश
चाँदनी मे
जहां मिलती अतृप्त
भावों को ठंडक
एक विश्रान्त दशा
अर्थ जीवन देती सी
हैसियत आदमी
बताती समझाती सी
कि जीवन अपना
अर्थ पाये।
छगन लाल गर्ग।


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