जीना चाहता
अनसीखी जिन्दगी
मुझे जीने दो
भर गया हैं मन अब
तर्को के व्यूह से
मुक्ति चाहता हूँ
घनी आकार हो गयी
शुष्कता
नही पाता आनन्द का एक भी कतरा
रस की महीन सी धार
कहां उतरी जीवन मेरे
जग के उपाय तुले हैं
विवेकी बनाने
ओर गुजारता हूँ
तमाम उम्र
तर्को के घने बियावन बीच
भीतर हो चुका
तूफानो का मंजार घना
जहां टकराते हैं तर्क
एक दूसरे से
कि स्नेह झील गंदली हो चुकी
जग बनता जाता
सभ्य ओर विवेकी लगातार
खुलते जाते हैं
नित नये तर्क के विद्यालय
ओर भरते जाते नित
नये नये तर्को का अंबार
उलझा हैं मेरा अस्तित्व
विचारों की गाँठो के गुम्फन बीच
भीतर हैं खालीपन
अत्याचार हैं यह
छोड़ दो ना
अब अकेला मुझे
कि भीतर के द्वार खोलू
अपनी श्वास लेने दो
तनिक तो
तर्को की मुर्दा हवा से
घूटता हूँ नित
आने तो दो थोड़ा सा
भोलेपन का नेह
सत्य का द्वार वहीं से
खुलता हैं
खिल उठते हैं नवल कुसुम
देते जाते महक घनी
अलौकिक
वहीं से सत्य आता
दिव्य सा
बन बन जाता हैं प्रार्थना
परमात्मा की
ओर टूटने लग जाते
भवो के बन्धन
अनसीखा ही रहने दो मुझे ।
छगन लाल गर्ग।
अनसीखी जिन्दगी
मुझे जीने दो
भर गया हैं मन अब
तर्को के व्यूह से
मुक्ति चाहता हूँ
घनी आकार हो गयी
शुष्कता
नही पाता आनन्द का एक भी कतरा
रस की महीन सी धार
कहां उतरी जीवन मेरे
जग के उपाय तुले हैं
विवेकी बनाने
ओर गुजारता हूँ
तमाम उम्र
तर्को के घने बियावन बीच
भीतर हो चुका
तूफानो का मंजार घना
जहां टकराते हैं तर्क
एक दूसरे से
कि स्नेह झील गंदली हो चुकी
जग बनता जाता
सभ्य ओर विवेकी लगातार
खुलते जाते हैं
नित नये तर्क के विद्यालय
ओर भरते जाते नित
नये नये तर्को का अंबार
उलझा हैं मेरा अस्तित्व
विचारों की गाँठो के गुम्फन बीच
भीतर हैं खालीपन
अत्याचार हैं यह
छोड़ दो ना
अब अकेला मुझे
कि भीतर के द्वार खोलू
अपनी श्वास लेने दो
तनिक तो
तर्को की मुर्दा हवा से
घूटता हूँ नित
आने तो दो थोड़ा सा
भोलेपन का नेह
सत्य का द्वार वहीं से
खुलता हैं
खिल उठते हैं नवल कुसुम
देते जाते महक घनी
अलौकिक
वहीं से सत्य आता
दिव्य सा
बन बन जाता हैं प्रार्थना
परमात्मा की
ओर टूटने लग जाते
भवो के बन्धन
अनसीखा ही रहने दो मुझे ।
छगन लाल गर्ग।
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