Thursday, 19 November 2015

मेरे कपड़े ।

मेरे कपड़े
सिलवाता हूँ
मंजे अनुभवी टेलर से
मजबूरी हैं
नहीं बना पाता
सामान्य टेलर
असामान्य विस्तार पाया
शरीर मेरा
आकृति नहीं दे पाते
कपडो को शरीर ढाँचे मे
शरीर संग गजब हूँ मैं
विशिष्टता लिए
बेकाम लगता
पर बड़ा काम का हूँ
अच्छे अच्छे ढूँढते ही पाते मुझे
छोटे बड़े सभी की
आस्था का केन्द्र हूँ मैं
बेढंगा हूँ बेढंगे काम को
अंजाम देता हूँ
काम औकात देख
दाम लेता हूँ
बूरे वक्त बाबू से लेकर
ऊँचे अफसरान तक
स्तुति करते हैं मेरी
गरजमंदो का भगवान हूँ मैं
श्रृद्धा से भैट चढाते हैं
आम आस्थावान भी
मेरी भी
ऊँचे ओहदेदारो की भी
इस भैट से ही रौनक हैं
जानते हैं आस्थावान
कीमत हमारी
जाने भी दो
अब कहना ठीक नहीं होगा
पर्दे मे रहना मजबूरी हैं
प्रजातंत्र हैं
अभिनय आता हैं
नियत ओर भाषा
अंग अंग बसी हैं
रस पच गयी हैं हमसे
दोनों का भौपू अच्छा बजाते हैं
सामर्थ्य से ज्यादा
जनता मे
सपने ओर क्रांति बीज
हमी तो बौते हैं
तकलीफ यही हैं
विस्तार हुआ हैं हमारा
हमारे बोये बीज
वृक्ष बन रहे हैं
बेढंगेपन का विस्तार
आम की मौत हैं
सुनते हो हमारा दर्द
रहस्यमयी घना हैं
उपाय हो तो बताओ
मानवता को छोडकर
वह डराती हैं हमें ।
छगन लाल गर्ग।

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