द्वेत हुआ जीवन
तन व मन
बन चुके अनमेल
नहीं रहा नियंत्रण
विचार व भावों के बीच
यह त्रासदी
करती जाती
जीवन का विश्लेषण
कि अभिप्राय रहा हूँ मैं
साक्षी हुआ
अब तक गुजरे क्षणो का
नहीं कर पाता अवलोकन
विगत तेरा
घना व्यतीत
धुन्धलका घेरता
कि छिपाता जाता
विभत्स दाग तेरे
होती हैं वितृष्णा घनी
अतीत की रंगीन कल्पनाऐ
कहां खाती मेल
अं श जीवन इस पल
सतरंगी उडानो के पंख
जर्जर हुए गति करते
नासमझी का संग्रहण
हुआ पीडा की गठरी
नहीं पाता शीतल ठोर
कि करू विश्राम
सर्द राते
अभिसार का संयोग नहीं
अब घनी लंबवत हुई
दर्द व्याप्त हुआ जाता
कसक पीर
नस नस देती व्याधि
दर्द भरती हैं हड्डिया
नहीं रही प्रवृत्ति अब
जन्मो से दौडने की
संग्रह सुखो निमित्त
दौडना ओर हाफना
यही तो किया जीवन
चलने की पीड़ा भी
ओर विश्राम पीड़ा भी
अजीब हूँ मैं
अस्तित्व होना भी पीड़ा
जिम्मेदारी ढोते ही
यह तन भी
यह मन भी
कंधे व पेर भी
दे चुके जवाब
इस पर भी
देखता रहता
चलने ओर बोझे का सार
व्यर्थ हुआ जाता
संक्रमण की बेला
न तो समाप्ति न प्रारंभ
यह शायद
विराग राग पनपा
समर्पित हुआ सा
स्नेह के सागर
जीवन का यह
अति सार हैं शायद
राग का प्रतिलोम
दोनों भाव नहीं देते
पहचान मेरी
अद्वेत कहां रहा जीना।
छगन लाल गर्ग।
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