Friday, 1 January 2016

शुभ कामनाऐ।

नहीं कर पाये निन्द
रात भर
शुभ कामनाओ के रहते
बीतता हर पल
अतीत बन उभरता
जो जिया
संभावनाओ को लेकर
बेहतरीन जिन्दगी के हर सपने
समेटता बीत गया बीता वर्ष
ओर नये वर्ष की शुभ कामनाऐ
मिटाती जाती निन्द के पल
रीता झोला लिए आये
यही संभाले रहे
अब फटा तार तार हुआ
नहीं ठहर पाते अच्छे दिन
पेबन्द के टान्के भरने
कि नहीं रही गुन्जाइश
तन लिपटे अरमान के झोले की
ओर शुभ कामनाऐ
संक्रमण पलो से निरंतर
बढती बौछार सी
नहीं देती ख्वाहिशो को तसस्ली
कि प्रगति के दौर मे
अस्तित्व रह सके कायम
यह नया वर्ष
सोये जख्मो को
शुभ कामनाओ से
ओर करता रहा जख्मी
नहीं मेरे अपनों
यथार्थ को शब्दों के पर्दे
मत दो
व्यवस्था मे परिवर्तन हो
कुछ शुभ संकेत
ऐसे भी आने दो
अब केवल घोषणा
शुभ कामना सोने नहीं देगी।
छगन लाल गर्ग।


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